गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

मन

मन बेचैन, मन चंचल
मन पागल, मन घायल
मन धरती, मन आकाश
मन नीर, मन ही कमल
मन हिरन और मन पंछी
मन बादल, मन बरसात
मन है अलक, मन है पलक
मन दर्पण और मन अर्पण
मन कलरव मन नीरव
मन मौजी ....मन मौजी

8 टिप्पणियाँ:

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

बहुत खूब व्याख्या की है मन की.

M VERMA ने कहा…

मन नीर, मन ही कमल
और फिर
मन मौजी ....मन मौजी

मन की मनमानी, मन ने कब मानी
बहुत खूबसूरती से मन को बयान किया है

abcd ने कहा…

ये कविता और लम्बी हो सकती थी.........होना भी चाह रही है............,क्यो नही हुई ??!!

Apanatva ने कहा…

sach hai har pal rang bhav badalata hai ye man .
sunder prastuti .

Apanatva ने कहा…

man har pal rang badal sakata hai......
bahut sunder abhivykti .............
man bhaee ye kavita ...............

संहिता ने कहा…

@abcd,
Completing this poem........
Will post it very soon.

kshama ने कहा…

Kitna sundar likha hai aapne!

anjana ने कहा…

मन को खूब परिभाषित किया आप ने ।सुन्दर..